॥आरती जुगलकिसोरकी की ॥

आरती जुगलकिसोरकी कीजै,

आरती जुगलकिसोरकी कीजै, तन मन धन न्योछावर कीजै ॥ टेक ॥
गौर स्याम मुख निरखन कीजै, प्रेम स्वरूप नयन भर पीजै ॥ १ ॥
रबि ससि कोटि बदनकी सोभा, ताहि देखि मेरो मन लोभा ॥ २ ॥
कंचन थाल कपूरकी बाती, हरि आये निर्मल भइ छाती ॥ ३ ॥
फूलनकी सेज फूलनकी माला, रत्न सिंहासन बैठे नन्दलाला ॥ ४ ॥
मोर मुकुट कर मुरली सोहै, नटवर वेष निरख मन मोहै ॥ ५ ॥
ओढ़ें पीत नील पट सारी, कुंजन ललना-लालबिहारी ॥ ६ ॥
श्रीपुरुषोत्तम गिरिवरधारी, आरति करत सकल ब्रजनारी ॥ ७ ॥
नंदनंदन वृषभानु-किसोरी, परमानँद प्रभु अबिचल जोरी ॥ ८ ॥

॥ श्री राधे-कृष्णाय नमः ॥

आरती जुगलकिसोरजी का धार्मिक महत्व

श्री राधा-कृष्ण को प्रेम, भक्ति और समर्पण का दिव्य स्वरूप माना जाता है। श्री राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण की संयुक्त उपासना भक्तों के हृदय में प्रेम, श्रद्धा और आनंद का भाव जगाती है। “आरती जुगलकिसोरकी कीजै, तन मन धन न्योछावर कीजै” एक भावपूर्ण भक्ति आरती है, जिसमें श्री राधा-कृष्ण के सुंदर स्वरूप, उनकी दिव्य छवि और उनके प्रति पूर्ण समर्पण का वर्णन किया गया है। इस आरती में भक्त अपने आराध्य श्री राधा-कृष्ण के दर्शन करके अपने मन को प्रेम और भक्ति से भर लेना चाहता है। इसमें श्रीकृष्ण के मोर मुकुट, मुरली और मनमोहक रूप के साथ श्री राधा रानी की सुंदरता और दोनों की अटूट जोड़ी की महिमा का गुणगान किया गया है।

1. तन, मन और धन का समर्पण

आरती की पहली पंक्ति हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा करने तक सीमित नहीं है। अपने विचारों, कर्मों और जीवन को भगवान के प्रति समर्पित करना भी भक्ति का महत्वपूर्ण अंग है। जब मन में श्रद्धा और प्रेम होता है, तब जीवन के प्रत्येक कार्य में भगवान का स्मरण बना रहता है।

2. श्री राधा-कृष्ण के दिव्य स्वरूप के दर्शन

“गौर स्याम मुख निरखन कीजै, प्रेम स्वरूप नयन भर पीजै” पंक्तियों में श्री राधा रानी और श्रीकृष्ण के मनमोहक स्वरूप के दर्शन करने की भावना व्यक्त होती है। भक्त अपने आराध्य के दर्शन करके मन में प्रेम, आनंद और शांति का अनुभव करना चाहता है।

3. आरती और दीपदान की महिमा

कंचन की थाली और कपूर की बाती से आरती करने का वर्णन भगवान के प्रति श्रद्धा और पवित्र भाव को दर्शाता है। आरती के समय दीपक की ज्योति के साथ भक्त अपने मन के अंधकार को दूर करने और सद्बुद्धि प्राप्त करने की प्रार्थना करता है।

4. श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप का वर्णन

मोर मुकुट, मुरली और नटवर वेश भगवान श्रीकृष्ण के प्रसिद्ध स्वरूप की याद दिलाते हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से भक्त अपने प्रिय श्यामसुंदर के रूप का ध्यान करता है और उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करता है।

5. श्री राधा-कृष्ण की अटूट जोड़ी

आरती की अंतिम पंक्तियों में नंदनंदन श्रीकृष्ण और वृषभानु-किशोरी श्री राधा रानी की अटूट जोड़ी की महिमा का वर्णन है। यह हमें प्रेम, विश्वास, समर्पण और भक्ति के महत्व की प्रेरणा देता है।

आरती करने का शुभ भाव

श्री राधा-कृष्ण की आरती करते समय मन को शांत रखकर प्रेम और श्रद्धा से उनके दिव्य स्वरूप का ध्यान करें। दीपक अर्पित करते हुए प्रार्थना करें कि हमारे जीवन में सद्बुद्धि, प्रेम, करुणा और भक्ति बनी रहे।

निष्कर्ष: “आरती जुगलकिसोरजी” श्री राधा-कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण व्यक्त करने वाली सुंदर भक्ति आरती है। इसका गायन भक्त को अपने आराध्य का स्मरण करने और जीवन में प्रेम, विनम्रता तथा सद्भाव अपनाने की प्रेरणा देता है।

॥ जय श्री राधे-कृष्ण ॥
॥ राधे राधे ॥

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